हिस्ट्री के कितने पार्ट होते हैं? - histree ke kitane paart hote hain?

आकांक्षा प्रभु, मुंबई

इतिहास (हिस्ट्री) अक्सर विद्यार्थियों को गले की हड्डी जैसा लगता है, लेकिन यदि विद्यार्थी इसकी बारीकियों से अवगत हो जाएं, उन्हें अच्छे से समझ लें तो उन्हें इस विषय से लगाव-सा हो जाता है। इतना ही नहीं, यह विषय स्कोरिंग भी बन जाता है। 12वीं (स्टेट बोर्ड) के आर्ट्स स्ट्रीम के छात्रों के लिए इतिहास विषय से जुड़ी अहम सलाह पेश कर रहे हैं घाटकोपर (प.) स्थित रामनिरंजन झुनझुनवाला कॉलेज में इतिहास के प्रफेसर सूरज शुक्ला प्रफेसर रंजना राव के सानिध्य में...

इन पर गौर जरूरी

वैसे तो छात्रों को सभी चैप्टर्स पर बराबर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि कहीं से भी कुछ भी पूछा जा सकता है। हालांकि कुछ चैप्टर्स ऐसे भी हैं, जिन पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। इनमें शामिल हैं- 3, 4, 6, 8 और 9। इन चैप्टर्स से अक्सर ज्यादा अंक वाले प्रश्न पूछे जाते हैं। चैप्टर नंबर 2, 5 और 7 में से वैकल्पिक (ऑब्जेक्टिव) प्रश्न ज्यादा पूछे जाते हैं। 30 में से 20 मार्क्स सिर्फ वैकल्पिक प्रश्नों के लिए ही होते हैं।

अहम विषय

चैप्टर नंबर 3 (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐंड हिस्ट्री)- यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और उसके इतिहास के बारे में है। इसमें ऑल इंडिया रेडियो, आकाशवाणी, रेडियो, टेलिविजन, ड्रामा, सिनेमा- इनके इतिहास, खोज व स्वरूप (नेचर) के बारे में बताया गया है। इस चैप्टर से रिक्त स्थान से जुड़े प्रश्न भी पूछे जाते हैं।

चैप्टर नंबर 4 (टूरिज़म ऐंड हिस्ट्री)- इस चैप्टर में पर्यटन और उसके इतिहास पर फोकस किया गया है। इस चैप्टर से रिक्त स्थान के साथ-साथ बड़े प्रश्न भी पूछे जाते हैं। 7 से 10 मार्क्स के लिए भी इस चैप्टर का अध्ययन अहम है।

चैप्टर नंबर 6 (हिस्टॉरिकल रिसर्च)- 12 मार्क्स के लिए इस चैप्टर से प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें से नैशनल आर्काइव्स पर शॉर्ट नोट, प्रिज़र्वेशन ऑफ मैन्युस्क्रिप्ट्स और सोर्स ऑफ मॉडर्न हिस्ट्री पर सवाल पूछे जा सकते हैं।

चैप्टर नंबर 8 (ऐडमिनिस्ट्रेटिव एग्जाम)- 12वीं के बाद विद्यार्थियों में चिंता का विषय होता है कि कला के क्षेत्र में आगे करियर क्या है/ यह चैप्टर उन्हें IAS, UPSC, MPSC, NET, SET, B.Ed जैसी परीक्षाओं को समझने में, इनका सिलेबस समझने में मदद करता है। परीक्षा में प्रश्न नंबर 6 में ज्यादातर इसी विषय से जुड़े प्रश्न विकल्प के साथ पूछे जाते हैं।

चैप्टर नंबर 9 (हिस्ट्री टीचर ऐंड टीचिंग मेथड)- इस चैप्टर से अक्सर 12 मार्क्स के लिए प्रश्न पूछे जाते हैं। पढ़ाने के तरीके (टीचिंग मेथड), इतिहास के शिक्षक की योग्यता एवं प्रतिभा (क्वॉलिफिकेशन ऑफ हिस्ट्री टीचर ऐंड वर्सटिलटी ऑफ हिस्ट्री टीचर)- ये प्रश्न भी काफी महत्वपूर्ण हैं। इतिहास विषय को रोमांचक बनाने में शिक्षक की सबसे अहम भूमिका रहती है। इस चैप्टर को समझने का सबसे अच्छा तरीका है अपने इतिहास के शिक्षक की छवि को सामने रखना।

एग्जाम टिप्स

12वीं के छात्रों की परीक्षा सर पर है। सभी छात्र परीक्षा की 'लास्ट मूमेंट स्टडी' में जुटे हुए होंगे। कोई सैंपल पेपर सॉल्व करने में लगा होगा, तो कोई रिविजन में। यहां हम आपको बता रहे हैं कि परीक्षा से पहले के अंतिम पलों में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अंतिम पलों में आपने जितना पढ़ा हो उसी का रिविजन करना चाहिए, बल्कि आखिरी पलों में तो किताब देखने के बजाए दिमाग को छोड़ा आराम देना चाहिए, ताकि परीक्षा के दौरान आपका दिमाग रिलैक्स रहे। साथ ही, इन बातों का भी रखें खास खयाल...

परीक्षा केंद्र पर पहुंचकर नए टॉपिक अथवा प्रश्नों की तैयारी बिल्कुल न करें।

हर प्रश्न के उत्तर लिखने के लिए समय पहले ही निर्धारित कर लें।

परीक्षा में प्रश्नों के आधे-अधूरे उत्तर हरगिज न लिखें।

मिलते-जुलते विषयों में सतर्कता बरतते हुए खयाल रहे कि आप किसी अन्य विषय से जुड़ी चीजें किसी दूसरे ही विषय के जवाब में लिख आएं।

इतिहास में कई बार छात्र अपना उत्तर लंबा करने के लिए फिजूल की चीजें लिख आते हैं।

इतिहास में अच्छे मार्क्स हासिल करने के नुस्खे

टेक्स्ट बुक में दिए प्रश्नों को ही पढ़ें।

लिख-लिख कर अभ्यास करने का तरीका जरूर अपनाएं। इस विषय के अभ्यास में यह तरीका बेहद जरूरी है।

प्रश्नों के जवाब पॉइंट्स में लिखें। इससे आपके जवाब स्पष्ट रूप से टू द पॉइंट दिखते हैं।

छात्रों में इतिहास की परीक्षा में लंबे-लंबे जवाब लिखने की आदत बहुत आम है। जितने मार्क्स का सवाल पूछा जाए, उसी के अनुसार शब्दों में अपने उत्तर लिखें।

पिछले कुछ सालों के प्रश्नपत्रों का अभ्यास भी जरूर करें, मदद मिलेगी।

जिन प्रश्नों के उत्तर अच्छे से पता हों, उन्हें पहले लिखें, कठिन बाद में।



इसमें कोई दो राय नहीं कि 12वीं का रिजल्ट विद्यार्थियों का भविष्य तय करता है, लेकिन इस भविष्य को बनाने के लिए विद्यार्थी को अपनी उम्दा लेखन कला प्रस्तुत करनी होती है। इतिहास हर विषय में सहायक सिद्ध हुआ है। इसमें विषय की सही समझ और बेहतर लेखन छात्रों को निश्चित रूप से अच्छे मार्क्स अर्जित कराते हैं।

प्रफेसर सूरज शुक्ला

इतिहास का प्रयोग विशेषतः दो अर्थों में किया जाता है। एक है प्राचीन अथवा विगत काल की घटनाएँ और दूसरा उन घटनाओं के विषय में धारणा इतिहास शब्द (इति + ह + आस ; अस् धातु, लिट् लकार अन्य पुरुष तथा एक वचन) का तात्पर्य है "यह निश्चित था"। ग्रीस के लोग इतिहास के लिए "हिस्टरी" (history) शब्द का प्रयोग करते थे। "हिस्टरी" का शाब्दिक अर्थ "बुनना" था। अनुमान होता है कि ज्ञात घटनाओं को व्यवस्थित ढंग से बुनकर ऐसा चित्र उपस्थित करने की कोशिश की जाती थी जो सार्थक और सुसंबद्ध हो। इस प्रकार इतिहास शब्द का अर्थ है - परम्परा से प्राप्त उपाख्यान समूह (जैसे कि लोक कथाएँ), वीरगाथा (जैसे कि महाभारत) या ऐतिहासिक साक्ष्य।[1] इतिहास के अंतर्गत हम जिस विषय का अध्ययन करते हैं उसमें अब तक घटित घटनाओं या उससे संबंध रखनेवाली घटनाओं का कालक्रमानुसार वर्णन होता है।[2] दूसरे शब्दों में मानव की विशिष्ट घटनाओं का नाम ही इतिहास है।[3] या फिर प्राचीनता से नवीनता की ओर आने वाली, मानवजाति से संबंधित घटनाओं का वर्णन इतिहास है।[4] इन घटनाओं व ऐतिहासिक साक्ष्यों को तथ्य के आधार पर प्रमाणित किया जाता है।

आम तौर पर यह समझा जाता है कि इतिहास की परंपरा सूत व चारण परंपरा से विकसित हुई, जिनके स्तुति काव्य स्वाभाविक रूप से राजाओं और उनके पूर्वजों के वीरता के कृत्यों, विजय और धार्मिकता की कहानियों पर केंद्रित था। इस तरह के पाठ और, बाद में, शिलालेख और साहित्यिक रचनाएँ, सम्राट की महानता और अक्सर उसके दिव्य-वंश की पुष्टि करने का काम करते। यह है एक शैली है जिसमे अतिशयोक्ति को किसी भी प्रकार से दोष नहीं माना जाता। परिणामस्वरूप,  रघुवंश और भरत वंश के राजवंशों की यशकाव्य की यह रचनाएं हैं एकत्रित होकर अंततः रामायण और महाभारत के स्मारकीय इतिहास-काव्यों में विकसित हुईं।[5]

इतिहास के मुख्य आधार युगविशेष और घटनास्थल के वे अवशेष हैं जो किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं। जीवन की बहुमुखी व्यापकता के कारण स्वल्प सामग्री के सहारे विगत युग अथवा समाज का चित्रनिर्माण करना दुःसाध्य है। सामग्री जितनी ही अधिक होती जाती है उसी अनुपात से बीते युग तथा समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करना साध्य होता जाता है। पर्याप्त साधनों के होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि कल्पनामिश्रित चित्र निश्चित रूप से शुद्ध या सत्य ही होगा। इसलिए उपयुक्त कमी का ध्यान रखकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि इतिहास की संपूर्णता असाध्य सी है, फिर भी यदि हमारा अनुभव और ज्ञान प्रचुर हो, ऐतिहासिक सामग्री की जाँच-पड़ताल को हमारी कला तर्कप्रतिष्ठत हो तथा कल्पना संयत और विकसित हो तो अतीत का हमारा चित्र अधिक मानवीय और प्रामाणिक हो सकता है। सारांश यह है कि इतिहास की रचना में पर्याप्त सामग्री, वैज्ञानिक ढंग से उसकी जाँच, उससे प्राप्त ज्ञान का महत्व समझने के विवेक के साथ ही साथ ऐतिहासक कल्पना की शक्ति तथा सजीव चित्रण की क्षमता की आवश्यकता है। स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास न तो साधारण परिभाषा के अनुसार विज्ञान है और न केवल काल्पनिक दर्शन अथवा साहित्यिक रचना है। इन सबके यथोचित संमिश्रण से इतिहास का स्वरूप रचा जाता है।

लिखित इतिहास का आरम्भ पद्य अथवा गद्य में वीरगाथा के रूप में हुआ। फिर वीरों अथवा विशिष्ट घटनाओं के संबंध में अनुश्रुति अथवा लेखक की पूछताछ से गद्य में रचना प्रारंभ हुई। इस प्रकार के लेख खपड़ों, पत्थरों, छालों और कपड़ों पर मिलते हैं। कागज का आविष्कार होने से लेखन और पठन पाठन का मार्ग प्रशस्त हो गया। लिखित सामग्री को अन्य प्रकार की सामग्री-जैसे खंडहर, शव, बर्तन, धातु, अन्न, सिक्के, खिलौने तथा यातायात के साधनों आदि के सहयोग द्वारा ऐतिहासिक ज्ञान का क्षेत्र और कोष बढ़ता चला गया। उस सब सामग्री की जाँच पड़ताल की वैज्ञानिक कला का भी विकास होता गया। प्राप्त ज्ञान को सजीव भाषा में गुंफित करने की कला ने आश्चर्यजनक उन्नति कर ली है, फिर भी अतीत के दर्शन के लिए कल्पना कुछ तो अभ्यास, किंतु अधिकतर व्यक्ति की नैसर्गिक क्षमता एवं सूक्ष्म तथा क्रांत दृष्टि पर आश्रित है। यद्यपि इतिहास का आरंभ एशिया में हुआ, तथापि उसका विकास यूरोप में विशेष रूप से हुआ।

एशिया में चीनियों, किंतु उनसे भी अधिक इस्लामी लोगों को, जिनको कालक्रम का महत्व अच्छे प्रकार ज्ञात था, इतिहासरचना का विशेष श्रेय है। मुसलमानों के आने के पहले हिंदुओं की इतिहास संबंध में अपनी अनोखी धारणा थी। कालक्रम के बदले वे सांस्कृतिक और धार्मिक विकास या ह्रास के युगों के कुछ मूल तत्वों को एकत्रित कर और विचारों तथा भावनाओं के प्रवर्तनों और प्रतीकों का सांकेतिक वर्णन करके संतुष्ट हो जाते थे। उनका इतिहास प्राय: काव्यरूप में मिलता है जिसमें सब कच्ची-पक्की सामग्री मिली जुली, उलझी और गुथी पड़ी है। उसके सुलझाने के कुछ-कुछ प्रयत्न होने लगे हैं, किंतु कालक्रम के अभाव में भयंकर कठिनाइयाँ पड़ रही हैं।

वर्तमान सदी में यूरोपीय शिक्षा में दीक्षित हो जाने से ऐतिहासिक अनुसंधान की हिंदुस्तान में उत्तरोत्तर उन्नति होने लगी है। इतिहास की एक नहीं, सहस्रों धाराएँ हैं। स्थूल रूप से उनका प्रयोग राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अधिक हुआ है। इसके सिवा अब व्यक्तियों में सीमित न रखकर जनता तथा उसके संबंध का ज्ञान प्राप्त करने की ओर अधिक रुचि हो गई है।

भारत में इतिहास के स्रोत हैं: ऋग्वेद और अन्‍य वेद जैसे यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ग्रंथ, इतिहास पुराणस्मृति ग्रंथ आदि। इन्हें ऐतिहासिक सामग्री कहते हैं।

पश्चिम में हिरोडोटस को प्रथम इतिहासकार मानते हैं।

इतिहास का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। प्रत्येक व्यक्ति, विषय, अन्वेषण आंदोलन आदि का इतिहास होता है, यहाँ तक कि इतिहास का भी इतिहास होता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि अन्य दृष्टिकोणों की तरह ऐतिहासिक दृष्टिकोण की अपनी निजी विशेषता है। वह एक विचारशैली है जो प्रारंभिक पुरातन काल से और विशेषत: 17वीं सदी से सभ्य संसार में व्याप्त हो गई। 19वीं सदी से प्राय: प्रत्येक विषय के अध्ययन के लिए उसके विकास का ऐतिहासिक ज्ञान आवश्यक समझा जाता है। इतिहास के अध्ययन से मानव समाज के विविध क्षेत्रों का जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है उससे मनुष्य की परिस्थितियों को आँकने, व्यक्तियों के भावों और विचारों तथा जनसमूह की प्रवृत्तियों आदि को समझने के लिए बड़ी सुविधा और अच्छी खासी कसौटी मिल जाती है।

इतिहास प्राय: नगरों, प्रांतों तथा विशेष देशों के या युगों के लिखे जाते हैं। अब इस ओर चेष्ठा और प्रयत्न होने लगे हैं कि यदि संभव हो तो सभ्य संसार ही नहीं, वरन् मनुष्य मात्र के सामूहिक विकास या विनाश का अध्ययन भूगोल के समान किया जाए। इस ध्येय की सिद्ध यद्यपि असंभव नहीं, तथापि बड़ी दुस्तर है। इसके प्राथमिक मानचित्र से यह अनुमान होता है कि विश्व के संतोषजनक इतिहास के लिए बहुत लंबे समय, प्रयास और संगठन की आवश्यकता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यदि विश्वइतिहास की तथा मानुषिक प्रवृत्तियों के अध्ययन से कुछ सर्वव्यापी सिद्धांत निकालने की चेष्टा की गई तो इतिहास समाजशास्त्र में बदलकर अपनी वैयक्तिक विशेषता खो बैठेगा। यह भय इतना चिंताजनक नहीं है, क्योंकि समाजशास्त्र के लिए इतिहास की उतनी ही आवश्यकता है जितनी इतिहास को समाजशासत्र की। वस्तुत: इतिहास पर ही समाजशास्त्र की रचना संभव है।

सैन्य इतिहास युद्ध, रणनीतियों, युद्ध, हथियार और युद्ध के मनोविज्ञान से संबंधित है। 1970 के दशक के बाद से "नए सैन्य इतिहास" जो जनशक्ति से अधिक सैनिकों के साथ, एवं रणनीति से अधिक मनोविज्ञान के साथ और समाज और संस्कृति पर युद्ध के व्यापक प्रभाव से संबंधित है।[6]

धर्म का इतिहास सदियों से धर्मनिरपेक्ष और धार्मिक इतिहासकारों दोनों के लिए एक मुख्य विषय रहा है, और सेमिनार और अकादमी में पढ़ाया जा रहा है। अग्रणी पत्रिकाओं में चर्च इतिहास, कैथोलिक हिस्टोरिकल रिव्यू, और धर्म का इतिहास शामिल है। विषय व्यापक रूप से राजनीतिक और सांस्कृतिक और कलात्मक आयामों से लेकर धर्मशास्त्र और मरणोत्तर गित तक फैला हुआ है।[7] यह विषय दुनिया के सभी क्षेत्रों और जगहों में धर्मों का अध्ययन करता है जहां मनुष्य रहते हैं।[8]

सामाजिक इतिहास, जिसे कभी-कभी "नए सामाजिक इतिहास" कहा जाता है, एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सामान्य लोगों के इतिहास और जीवन के साथ सामना करने के लिए उनकी रणनीतियाँ शामिल हैं। अपने "स्वर्ण युग" 1960 और 1970 के दशक में यह विद्वानों के बीच एक प्रमुख विषय था, और अभी भी इतिहास के विभागों में इसकी अच्छी पैठ है। 1975 से 1995 तक दो दशकों में, अमेरिकी इतिहास के प्रोफेसरों का अनुपात सामाजिक इतिहास के साथ-साथ 31% से बढ़कर 41% हो गया, जबकि राजनीतिक इतिहासकारों का अनुपात 40% से 30% तक गिर गया।

1980 और 1990 के दशक में सांस्कृतिक इतिहास ने सामाजिक इतिहास कि जगह ले ली। यह आम तौर पर नृविज्ञान और इतिहास के दृष्टिकोण को भाषा, लोकप्रिय सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक अनुभवों की सांस्कृतिक व्याख्याओं को देखने के लिए जोड़ती है। यह पिछले ज्ञान, रीति-रिवाजों और लोगों के समूह के कला के अभिलेखों और वर्णनात्मक विवरणों की जांच करता है। लोगों ने कैसे अतीत की अपनी स्मृति का निर्माण किया है, यह एक प्रमुख विषय है। सांस्कृतिक इतिहास में समाज में कला का अध्ययन भी शामिल है, साथ ही छवियों और मानव दृश्य उत्पादन (प्रतिरूप) का अध्ययन भी है।

राजनयिक इतिहास राष्ट्रों के बीच संबंधों पर केंद्रित है, मुख्यतः कूटनीति और युद्ध के कारणों के बारे में। हाल ही में यह शांति और मानव अधिकारों के कारणों को देखता है। यह आम तौर पर विदेशी कार्यालय के दृष्टिकोण और लंबी अवधि के रणनीतिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है, जैसा कि निरंतरता और इतिहास में परिवर्तन की प्रेरणा शक्ति है। इस प्रकार के राजनीतिक इतिहास समय के साथ देशों या राज्य सीमाओं के बीच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के संचालन का अध्ययन है। इतिहासकार म्यूरीयल चेम्बरलेन ने लिखा है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद, "राजनयिक इतिहास ने ऐतिहासिक जांच के प्रमुख के रूप में संवैधानिक इतिहास का स्थान ले लिया, जोकि कभी सबसे ऐतिहासिक, सबसे सटीक और ऐतिहासिक अध्ययनों में सबसे परिष्कृत था"।[9] उन्होंने कहा कि 1945 के बाद, प्रवृत्ति उलट गई है, अब सामाजिक इतिहास ने इसकी जगह ले ली है।

यद्यपि 19वीं सदी के उत्तरार्ध से ही आर्थिक इतिहास अच्छी तरह से स्थापित है, हाल के वर्षों में शैक्षिक अध्ययन पारंपरिक इतिहास विभागों से स्थानांतरित हो कर अधिक से अधिक अर्थशास्त्र विभागों की तरफ चला गया है। व्यावसायिक इतिहास व्यक्तिगत व्यापार संगठनों, व्यावसायिक तरीकों, सरकारी विनियमन, श्रमिक संबंधों और समाज पर प्रभाव के इतिहास से संबंधित है। इसमें व्यक्तिगत कंपनियों, अधिकारियों और उद्यमियों की जीवनी भी शामिल है यह आर्थिक इतिहास से संबंधित है; व्यावसायिक इतिहास को अक्सर बिजनेस स्कूलों में पढ़ाया जाता है

पर्यावरण का इतिहास एक नया क्षेत्र है जो 1980 के दशक में पर्यावरण के इतिहास विशेष रूप से लंबे समय में और उस पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव को देखने के लिए उभरा।

विश्व इतिहास पिछले 3000 वर्षों के दौरान प्रमुख सभ्यताओं का अध्ययन है। विश्व इतिहास मुख्य रूप से एक अनुसंधान क्षेत्र की बजाय एक शिक्षण क्षेत्र है। इसे 1980 के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और अन्य देशों में लोकप्रियता हासिल हुई थी, जिससे कि छात्रों को बढ़ते हुए वैश्वीकरण के परिवेश में दुनिया के लिए व्यापक ज्ञान की आवश्यकता होगी।

जूलियस औरेलिउस जेनोबियस अभिलेख, पलमायरा

इतिहासकार पिछली घटनाओं की जानकारी एकत्र करते हैं, इकट्ठा करते हैं, व्यवस्थित करते हैं और प्रस्तुत करते हैं। वे इस जानकारी को पुरातात्विक साक्ष्य के माध्यम से खोजते हैं, जो भूतकाल में प्राचीन स्रोतों जैसे पाण्डुलिपि, शिलालेख आदि से लिये गये और लिखे गए होते हैं। जैसे जगह के नाम, उनकी विचारधारा आवास, व्यवस्था, सामाजिक संस्था, सामाजिक उत्थान और भाषा आदि।

इतिहासकारों की सूची में, इतिहासकारों को उस ऐतिहासिक काल के क्रम में समूहीकृत किया जा सकता है, जिसमें वे लिख रहे थे, जो जरूरी नहीं कि वह अवधि, जिस अवधि में वे विशेषीकृत थे या निपुण थे क्रॉनिकल्स और एनलिस्ट, हालांकि वे सही अर्थों में इतिहासकार नहीं हैं, उन्हें भी अक्सर शामिल किया जाता है।

छद्मइतिहास उन लेखों/रचनाओं के लिये प्रयुक्त किया जाता है जिनकी सामग्री की प्रकृति 'इतिहास जैसी' होती है किन्तु वे इतिहास-लेखन की मानक विधियों से मेल नहीं खाती। इसलिये उनके द्वारा दिये गये निष्कर्ष भ्रामक एवं अविश्वसनीय बन जाते हैं। प्राय: राष्ट्रीय, राजनैतिक, सैनिक, एवं धार्मिक विषयों के सम्बन्ध में नये एवं विवादित और काल्पनिक तथ्यों पर आधारित इतिहास को छद्मइतिहास की श्रेणी में रखा जाता है।

मानव सभ्यता का इतिहास वस्तुत: मानव के विकास का इतिहास है, पर यह प्रश्न सदा विवादग्रस्त रहा है कि आदि मनव और उसकी सभ्यता का विकास कब और कहाँ हुआ। इतिहास के इसी अध्ययन को प्रागैतिहास कहते हैं। यानि इतिहास से पूर्व का इतिहास। प्रागैतिहासिक काल की मानव सभ्यता को ४ भागों में बाँटा गया है।

  • आदिम पाषाण काल
  • पूर्व पाषाण काल
  • उत्तर पाषाण काल
  • धातु काल

असभ्यता से अर्धसभ्यता, तथा अर्धसभ्यता से सभ्यता के प्रथम सोपान तक हज़ारों सालों की दूरी तय की गई होगी। लेकिन विश्व में किस समय किस तरह से ये सभ्यताएँ विकसित हुईं इसकी कोई जानकारी आज नहीं मिलती है। हाँ इतना अवश्य मालूम हो सका है कि प्राचीन विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों की घाटियों में ही उदित हुईं और फली फूलीं। दजला-फ़रात की घाटी में सुमेर सभ्यता, बाबिली सभ्यता, तथा असीरियन सभ्यता, नील की घाटी में प्राचीन मिस्र की सभ्यता तथा सिंधु की घाटी में सिंधु घाटी सभ्यता का विकास हुआ।

इतिहास के कितने पार्ट हैं?

जैसे भारतीय साँस्कृतिक इतिहास को प्रागैतिहासिक साँस्कृतिक इतिहास, वैदिक कालीन साँस्कृतिक इतिहास, प्राचीन कालीन साँस्कृतिक इतिहास मध्यकालीन साँस्कृतिक इतिहास, आधुनिक कालीन साँस्कृतिक इतिहास में बांट कर अध्ययन किया जा सकता है, जिसमें संबंधित काल के साँस्कृतिक जन जीवन का क्रमिक कालक्रमानुसार अध्ययन किया जा सकता है।

इतिहास के 3 भाग कौन से हैं?

इतिहास के 3 खंड और परिभाषा ... महाजनपद.

भारतीय इतिहास का पिता कौन है?

Megasthenes (Μεγασθένης, सीए 350 - 2 9 0 ईसा पूर्व) भारत के पहले विदेशी राजदूत थे और उन्होंने इंडिका के नाम से जाने वाली मात्रा में अपने नृवंशविज्ञान अवलोकन दर्ज किए। अपने अग्रणी काम के लिए उन्हें भारतीय इतिहास के पिता के रूप में जाना जाता है।

इतिहास की शुरुआत कब से हुई थी?

भारत का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना माना जाता है। 65,000 साल पहले, पहले आधुनिक मनुष्य, या होमो सेपियन्स, अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में पहुँचे थे, जहाँ वे पहले विकसित हुए थे। सबसे पुराना ज्ञात आधुनिक मानव आज से लगभग 30,000 वर्ष पहले दक्षिण एशिया में रहता है।